श्री संतोषी आरती (१)
जय संतोषी माता,
जय संतोषी माता,
मैया जय संतोषी माता ।
अपने सेवक जन को,
सुख संपति दाता ॥
जय सुंदर चीर सुनहरी,
मां धारण कीन्हो ।
हीरा पन्ना दमके,
तन श्रृंगार लीन्हो ॥
जय गेरू लाल छटा छवि,
बदन कमल सोहे ।
मंद हँसत करूणामयी,
त्रिभुवन जन मोहे ॥
जय स्वर्ण सिंहासन बैठी,
चंवर ढुरे प्यारे ।
धूप, दीप, मधुमेवा,
भोग धरें न्यारे ॥
जय गुड़ अरु चना परमप्रिय,
तामे संतोष कियो ।
संतोषी कहलाई,
भक्तन वैभव दियो ॥
जय शुक्रवार प्रिय मानत,
आज दिवस सोही ।
भक्त मण्डली छाई,
कथा सुनत मोही ॥
जय मंदिर जगमग ज्योति,
मंगल ध्वनि छाई ।
विनय करें हम बालक,
चरनन सिर नाई ॥
जय भक्ति भावमय पूजा,
अंगीकृत कीजै ।
जो मन बसे हमारे,
इच्छा फल दीजै ॥
जय दुखी, दरिद्री, रोगी,
संकटमुक्त किए ।
बहु धनधान्य भरे घर,
सुख सौभाग्य दिए ॥
जय ध्यान धर्यो जिस जन ने,
मनवांछित फल पायो ।
पूजा कथा श्रवण कर,
घर आनंद आयो ॥
जय शरण गहे की लज्जा,
राखियो जगदंबे ।
संकट तू ही निवारे,
दयामयी अंबे ॥
जय संतोषी मां की आरती,
जो कोई नर गावे ।
ॠद्धिसिद्धि सुख संपत्ति,
जी भरकर पावे ॥
संतोषी